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हरेला : हरियाली, स्वास्थ्य और औषधीय समृद्धि का लोकपर्व — इसे वैश्विक जनआंदोलन बनाने का समय

डॉ. राजीव कुरेले

उत्तराखंड की पावन भूमि केवल देवभूमि ही नहीं, बल्कि औषधियों, वनों और जैव विविधता की भी भूमि है। यहां का प्रत्येक लोकपर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। इन्हीं लोकपर्वों में हरेला सबसे महत्वपूर्ण पर्व है, जो हरियाली, कृषि, पर्यावरण संरक्षण, समृद्धि और मानव स्वास्थ्य का प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व का जीवंत दर्शन है। हरेला हमें यह सिखाता है कि यदि धरती हरी-भरी रहेगी, तभी मानव जीवन स्वस्थ, समृद्ध और सुरक्षित रहेगा। उत्तराखंड में यह पर्व वर्षा ऋतु और नई कृषि चक्र की शुरुआत के साथ मनाया जाता है तथा पौधारोपण और प्रकृति संरक्षण का जनसंदेश देता है।

आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता के क्षरण और बढ़ती जीवनशैली जनित बीमारियों से जूझ रहा है, तब हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। यह पर्व हमें बताता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य का अटूट संबंध

आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है कि मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। स्वच्छ वायु, शुद्ध जल, उर्वर भूमि और हरे-भरे वन ही स्वस्थ समाज की आधारशिला हैं। वृक्ष वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं तथा मिट्टी और जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हरेला पर्व केवल पौधे लगाने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि पौधों को जीवित रखने और उन्हें परिवार का सदस्य मानने की संस्कृति भी विकसित करता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष कम से कम एक पौधा लगाए और उसकी देखभाल करे, तो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित पर्यावरण दिया जा सकता है।

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