भूस्खलन के हाई रिस्क जोन में चमोली जिले का 33% हिस्सा, 24 फैक्टर्स का वैज्ञानिक अध्ययन, जानें ऋषिगंगा जैसी आपदाओं के पीछे की वजह
देहरादून: उत्तराखंड के चमोली जिले में लगातार हो रहे भूस्खलन पर वैज्ञानिकों ने एक नई स्टडी की है. वैज्ञानिक इस भूस्खलन को प्राकृतिक आपदा नहीं मान रहे हैं. वैज्ञानिकों ने चमोली जिले में भूस्खलनों के पैटर्न का अध्ययन किया है, जिसके बाद वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि चमोली जिले का 452 वर्ग किमी क्षेत्र लैंडस्लाइड की दृष्टि से काफी संदेवनशील है.
वैज्ञानिकों की यह स्टडी रिपोर्ट Comparative Assessment of Landslide Susceptibility Using Heuristic and Statistical Models in Chamoli Uttarakhand के नाम से International Journal of Geo-Engineering में हाल ही में 07 सितंबर 2026 को प्रकाशित हुई है. यह रिपोर्ट कई संस्थानों के वैज्ञानिकों की स्टडी पर आधारित है.
स्टडी रिपोर्ट के वैज्ञानिक:
- संदीप कुंवर, ग्राफिक एरा, उत्तराखंड.
- हरीश कोहली, ग्राफिक एरा, उत्तराखंड.
- हर्ष कुमार, Department of Geoinformatics, Netaji Subhas University of Technology, Dwarka, New Delhi, India.
- जयंता दास, Department of Geography, Rampurhat College, Birbhum, Rampurhat.
वैज्ञानिकों का मानना है कि चमोली में पहाड़ की प्राकृतिक कमजोरी होने के साथ-साथ सड़क नेटवर्क, नदियों के नजदीक की ढलान, बारिश, भूगर्भीय संरचना और वनक्षरण (वनों के क्षेत्र में कमी आना) भी भूस्खलन के खतरे को लगातार बढ़ा रहा है.
भूस्खलन वाले 1,821 जगहों को चिन्हित किया गया: स्टडी रिपोर्ट के अनुसार, वैज्ञानिकों ने चमोली जिले में सबसे पहले भूस्खलन वाले 1,821 स्थानों को चिन्हित किया. इसके बाद वैज्ञानिकों ने 24 अलग-अलग प्राकृतिक और मानवजनित कारणों को मिलाकर यह जानने का प्रयास किया कि चमोली में भूस्खलन किन परिस्थितियों में ज्यादा होता है, और भविष्य में कौन-कौन से क्षेत्र सबसे ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं.
स्टडी में तीन मॉडल का इस्तेमाल किया गया: इस अध्ययन में तीन मॉडल का उपयोग किया गया है. पहला- फ्रीक्वेंसी रेशियो (Frequency Ratio), दूसरा- शान्नोन एंट्रोपी (Shannon Entropy) और तीसरा- एनालिटिकल हियार्ची प्रोसेस (Analytical Hierarchy Process) शामिल है.
फ्रीक्वेंसी रेशियो मॉडल सबसे बेहतर: स्टडी में फ्रीक्वेंसी रेशियो (Frequency Ratio) मॉडल सबसे ज्यादा बेहतर पाया गया. इसलिए वैज्ञानिकों ने कुल 1,821 भूस्खलन क्षेत्रों से 1,260 यानी 70 फीसदी लैंडस्लाइड इलाके की स्टडी फ्रीक्वेंसी रेशियो के आधार पर ही की. बाकी के 30 प्रतिशत भाग यानी 561 भूस्खलन क्षेत्रों की स्टडी अलग-अलग तरीखों यानी पैरामीटरों से की गई. स्टडी में 0.001 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल से छोटे भूस्खलनों को बाहर रखा गया है.
भूस्खलन के कारणों को जानने की भी कोशिश की गई: स्टडी में सबसे ज्यादा फोक्स भूस्खलन की कॉमन कंडीशन पर किया गया. इसके लिए 24 फैक्ट्स को लिया गया, जिसमें ढलान, ऊंचाई, भूगर्भीय संरचना, बारिश, नदी और नालों से दूरी, सड़क से दूरी, फॉल्ट और लाइनामेंट से दूरी, ड्रेनेज डेंसिटी, भूमि उपयोग, नॉर्मलाइज्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (NDVI), जंगलों में बदलाव, मिट्टी, भूकंपीय गतिविधि, टेरेन रेडनेस (terrain ruggedness) समेत अन्य फैक्टर्स शामिल हैं. ताकि प्राकृतिक, मौसम, पानी, भूगर्भ और मानवीय हस्तक्षेप को एक साथ रखकर जोखिम का आकलन किया जा सके.
वन आवरण में बदलाव की स्टडी: इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने लैंडस्लाइड क्षेत्र में साल 2008 और साल 2024 के वन आवरण (Forest Cover) का भी का भी अध्ययन किया. इस दौरान सामने आया है कि डिफोरेस्टेशन वाले क्षेत्र में लैंडस्लाइड का फ्रीक्वेंसी रेशियों 5.340 था, जबकि स्थिर वन क्षेत्र में लैंडस्लाइड का फ्रीक्वेंसी रेशियों काफी मिली है.
इसे आसान भाषा में ऐसे समझें सैटेलाइट इमेज में कुल लैंडस्लाइड क्षेत्र के करीब 3.13 फीसदी में डिफोरेस्टेशन (वनों का कटान) बहुत ज्यादा हुआ और उसी इलाके में लैंडस्लाइड का हिस्सा करीब 16.70 फीसदी था. मतलब साफ है कि पेड़ों की कटाई वाले इलाकों में भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
लैंडस्लाइड का प्रमुख कारण बन रही सड़कें: वैज्ञानिकों ने सड़क से भूस्खलन क्षेत्र की दूरी की स्टडी भी अलग-अलग पैरामीटर पर की है. अध्ययन के स्पेशल एनालिसिस (spatial analysis) में हाई और वेरी हाई ससेप्टिबिलिटी वाले क्षेत्रों खास तौर पर रोड कॉरिडोर और रिवर बैंक्स के दिखाई दिया. सीधे तौर पर देखें तो सड़कें भूस्खलन (landslides) को बढ़ावा देती हैं और लैंडस्लाइड का प्रमुख कारण भी बनती है. चमोली जैसे जिले में सड़कें घाटियों और ढलानों से होकर गुजरती हैं, जहां आबादी, पर्यटन, बिजली परियोजनाएं और परिवहन भी हैं. इस वजह से यह सब चीजें लैंडस्लाइड के साथ एक खतरनाक कॉम्बिनेशन बनाते है.
संवेदनशीलता के आधार पर पांच श्रेणियों में बांटा गया: फ्रीक्वेंसी रेशियो के आधार पर चमोली क्षेत्र को संवेदनशीलता के आधार पर पांच श्रेणियों में बांटा गया, जो इस प्रकार है 556.57 वर्ग किमी क्षेत्र (7.14 फीसदी) वेरी लो श्रेणी, 2054.64 वर्ग किमी क्षेत्र (26.36 फीसदी) लो श्रेणी, 2552.05 वर्ग किमी क्षेत्र (32.74 फीसदी) मॉडरेट श्रेणी, 2178.40 वर्ग किमी क्षेत्र (27.95 फीसदी) हाई श्रेणी और 452.85 वर्ग किमी क्षेत्र (5.81 फीसदी) वेरी हाई श्रेणी में रखा गया है. संवेदनशीलता मैप में चमोली जिले के 7,794 वर्ग किमी क्षेत्र में से 2,631 वर्ग किमी क्षेत्र हाई या वेरी हाई श्रेणी में पाया गया है. ऐसे में इन पूरे क्षेत्रों में भूस्खलन की पूरी संभावना है.


